रासो रामायण: महाकाव्य
₹499.00
- By: डॉ. प्रदीप पाण्डेय ”हरिश्वती”
- ISBN: 9789376860746
- Price: 499/-
- Page: 350
- Size: 6×9
- Category: POETRY / General
- Language: Hindi
- Delivery Time: 07-09 Days
Description
About The Book
रासो रामायण : एक वृहद् रचना
हिंदी साहित्य का आरंभ आदिकाल में ‘रासो’ से माना जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। वीरगाथा काल में रासो ही सर्वप्रथम लिखे गए। किन्तु चौदहवीं सदी तक रासो-लेखन का अवसान संभवतः विदेशी संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर आक्रमण था। रासो की गायन-लेखन परंपरा देश में जोश भर सकती थी, इसलिए तत्कालीन शासकों ने या तो इस पर कार्य नहीं होने दिया या अरबी को राजभाषा बनाकर इसे दबाया। चार सौ साल बाद इस मृत संस्कृति को सागर से पुनर्जीवित करना सुखद है।
राम पर अनेक रचनाएँ लिखी गईं, परंतु ‘रासो रामायण’ देश का पहला राम-केंद्रित रासो है। राम केवल पौराणिक नायक नहीं, मानवीय मूल्यों के जीवंत प्रतीक हैं। वे भारत के जनमानस की प्राणशक्ति हैं। भौतिकवादी युग में जहाँ स्वार्थ सर्वोपरि है, राम का त्याग हमें ‘स्व’ से ऊपर उठना सिखाता है। कबीर कहते हैं- _कस्तूरी कुंडली मृग बसे, मृग फिरे वन माहीं। ऐसे घट घट राम है, दुनियां जानत नाहीं।_ राम के आदर्श अपना लेने से नैतिक विघटन रुक सकता है।
रामचरित्र पर लिखना सरल है, किंतु सम्पूर्ण जीवन को गेय महाकाव्य बनाना दुष्कर है। यह कृपा-साध्य है। तुलसीदास ने कहा- _’निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा’_। राम का शांत व्यक्तित्व मानसिक स्थिरता देता है, हनुमान चरित्र निःस्वार्थ सेवा सिखाता है।
मैथिलीशरण गुप्त के ‘साकेत’ 1931 के बाद ‘रासो रामायण’ का नाम गौरव से लिया जाएगा। इसकी विशेषता है कि प्रत्येक घटना को विषय रूप देकर सहज-गेय बनाया गया है। सामाजिक उथल-पुथल के इस दौर में रामकथा वैश्विक विरासत है जो संस्कृतियों को जोड़ती है। ‘रासो रामायण’ निश्चित ही कारगर सिद्ध होगा।
About The Author
डॉ. प्रदीप पाण्डेय”हरिश्वती”
डॉ. प्रदीप पाण्डेय का जन्म 18 फरवरी, 1975 को सागर, मध्यप्रदेश में हुआ। शासकीय अभिलेखों में जन्मतिथि 01 अप्रैल, 1975 अंकित है। आप बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी साहित्यकार, शिक्षाविद् एवं समाजसेवी हैं।
शैक्षणिक उपलब्धियाँ
आपने डॉ. ऑफ एंट्रप्रोन्योरशिप मैनेजमेंट की उपाधि प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त ई-एम.बी.ए. इन एच.आर., एम.ए. इतिहास एवं समाजशास्त्र तथा डिप्लोमा इन सोशल वर्क एंड एक्सटेंशन में दक्षता हासिल की है।
*सम्मान एवं पुरस्कार*
साहित्य एवं समाज सेवा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान हेतु आपको 2018 में ‘एक्सीलेंस अवार्ड’ सागर टीवी न्यूज द्वारा तथा 2023 में ‘अंतर्राष्ट्रीय राजीव गांधी समरसता अवार्ड’ से अलंकृत किया गया।
*साहित्यिक अवदान*
आपका महाकाव्य ‘रामायण रासो’ हिंदी साहित्य की एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। उपन्यास ‘पक्षद्रोह- डार्क फेस ऑफ नेशन’ तथा काव्य संग्रह ‘वक्त की ही तू तलाश है’ आपकी लेखनी की विविधता दर्शाते हैं। आपने सागर की प्रथम कलर्ड मेग्जीन ‘सिटी गाईड’ 2000, ‘शताब्दी परीक्षा विशेष’ 2001 तथा ‘सिटी गाईड’ 2014 का संपादन किया। प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में आपके मोटिवेशनल, राजनैतिक एवं सामाजिक आलेख निरंतर प्रकाशित होते हैं।
*सृजनात्मक कार्य*
डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘तिल-तिल मरती झील’, ‘जिम्मेदार कौन?’, ‘सॉरी बापू’ का निर्माण एवं शॉर्ट फिल्म ‘कल के सुपर स्टार’ के गीत ‘जब तक मैंने समझा, लम्हे बदल गए’ का लेखन किया। दैनिक ‘सर्च स्टोरी’ में 2024-25 तक साप्ताहिक स्तंभकार एवं ब्यूरो चीफ रहे।
*सामाजिक-सांस्कृतिक योगदान*
बुंदेलखंड में 135 सांस्कृतिक कार्यक्रम, नाटक एवं व्यक्तित्व विकास प्रतियोगिताओं का आयोजन किया। 2005 में प्रख्यात मोटिवेशनल लेखक विजय अग्रवाल का व्याख्यान कराया।
*शैक्षणिक सेवा*
2003 से 2008 तक ‘The Way’ इंस्टीट्यूट के माध्यम से निःशुल्क प्रतियोगी परीक्षा कोचिंग दी, जिससे 3,300 विद्यार्थी चयनित हुए।
*संप्रति*
वर्तमान में सांस्कृतिक-साहित्यिक सृजन एवं सामाजिक कार्यों में पूर्णतः समर्पित हैं।







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