वैदिक देव-विमर्श: वैदिक साहित्य में देव-अवधारणा का समीक्षात्मक अध्ययन
₹400.00
- By: डॉ. विभा सिंह
- ISBN: 9789376865994
- Price: 400/-
- Page: 277
- Size: 6×9
- Category: SELF-HELP / General
- Language: Hindi
- Delivery Time: 07-09 Days
Description
About The Book
‘वैदिक देव-विमर्श’ वैदिक साहित्य में निहित देव-अवधारणा का एक व्यवस्थित, प्रमाण-आधारित एवं समीक्षात्मक अध्ययन है। ऋग्वेद के प्रथम मंत्र से लेकर उपनिषदों के ब्रह्मवाद तक, यह ग्रंथ एक मूल प्रश्न का अन्वेषण करता है। वैदिक ‘देव’ वस्तुतः हैं क्या? क्या वे प्रकृति-शक्तियों के मानवीकृत रूप हैं, यज्ञीय कर्मकाण्ड के अधिष्ठाता हैं, एक ही परमेश्वर के गुणवाचक नाम हैं, अथवा साधक की चेतना में क्रियाशील दिव्य शक्तियों के प्रतीक ?
छह अध्यायों में नियोजित यह ग्रंथ वैदिक वाङ्गय के परिचय एवं ‘देव’ शब्द की व्युत्पत्ति से आरम्भ होकर देवों के पृथिवी-अन्तरिक्ष-द्युस्थानीय वर्गीकरण, इन्द्र-अग्नि-वरुण-सोम सहित प्रमुख देवों एवं देवियों के विस्तृत विमर्श, ऋत-केन्द्रित वैदिक देववाद के दार्शनिक विकास तथा नासदीय, पुरुष एवं हिरण्यगर्भ जैसे सृष्टि-सूक्तों के विश्लेषण तक पहुँचता है। इसकी विशेष उपलब्धि है- यास्क, सायण, स्वामी दयानन्द, श्री अरविन्द एवं पाश्चात्य विद्वानों की व्याख्या-परम्पराओं का तुलनात्मक मूल्यांकन, जिसमें ‘एक मंत्र, चार दृष्टियाँ’ जैसे प्रयोग-परीक्षण द्वारा प्रत्येक पद्धति की देन एवं सीमा को परखा गया है। अंतिम अध्याय भारोपीय तुलनात्मक विमर्श, पौराणिक देवमण्डल में रूपांतरण तथा समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डालता है। ग्रंथ की स्थापना है कि वैदिक देव-अवधारणा एकरेखीय नहीं, बहुस्तरीय है; आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक दृष्टियाँ परस्पर विरोधी नहीं, पूरक हैं। समृद्ध परिशिष्टों मण्डलानुसार देव-सूक्त तालिकाओं, पारिभाषिक शब्दावली, चयनित मंत्रों के भावार्थ एवं ग्रंथ-सूची के कारण यह पाठ्य-पुस्तक और संदर्भ-ग्रंथ दोनों रूपों में उपयोगी है। शोधार्थियों, अध्यापकों एवं स्वाध्यायशील पाठकों के लिए हिंदी में यह एक बहुप्रतीक्षित कृति है।
About The Author
डॉ. विभा सिंह संस्कृत एवं वैदिक साहित्य की समर्पित अध्येत्री हैं, जो वर्तमान में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के संस्कृत विभाग में अतिथि अध्यापिका के रूप में कार्यरत हैं।
वैदिक साहित्य, विशेषतः ब्राह्मण-ग्रंथ, मंत्रार्थ-विमर्श एवं देव-अवधारणा उनके शोध के प्रमुख क्षेत्र हैं। उनकी प्रथम पुस्तक ‘शतपथ ब्राह्मण कालीन समाज’ (रेवा प्रकाशन, दिल्ली, 2023) विद्वत्-जगत् में समादृत हुई है। ‘भास्वती’, ‘वाराणसी मैनेजमेंट रिव्यू’ एवं ‘रिसर्च हाईलाइट्स’ जैसी शोध-पत्रिकाओं में ‘वैदिक मंत्रार्थ विमर्श’, ‘वेदों में अभिव्यक्त देव विषयक धारणा’, ‘औपनिषद दर्शन का अवदान’, ‘ऋग्वैदिक वाङ्गय में मनोविज्ञान’ सहित उनके अनेक शोध-पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। ‘वेद और आगम’ तथा ‘ब्राह्मण साहित्य में आगम’ विषयों पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में उन्होंने शोध-पत्र प्रस्तुत किए हैं और अनेक राष्ट्रीय कार्यशालाओं एवं संकाय-विकास कार्यक्रमों में सक्रिय सहभागिता की है। प्रस्तुत ग्रंथ ‘वैदिक देव-विमर्श’ उनके वर्षों के वैदिक अध्ययन-अनुशीलन का परिणाम है।






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