ययाति-मनुष्य की खोज | Yayati-Manushya Ki Khoj
₹250.00
- By: Sachin A Lele
- ISBN: 9789376864454
- Price: 250/-
- Page: 149
- Size: 5×8
- Category: SELF-HELP / General
- Language: Hindi
- Delivery Time: 07-09 Days
Description
About the Book
मनुष्य वास्तव में खोज क्या रहा है?
सुख ? प्रेम ? सफलता ? शक्ति ? यश ? अमरत्व ?
या इन सबके पीछे छिपी हुई स्वयं की खोज ?
“मनुष्य की खोज” महाभारत के प्रसिद्ध पात्न राजा ययाति की कथा के माध्यम से मनुष्य के इसी शाश्वत प्रश्न की दार्शनिक यात्ना है। यह न तो महाभारत का पुनर्कथन है, न किसी पौराणिक कथा का आधुनिक रूपांतरण। यह एक ऐसा चिंतन है जो ययाति के जीवन को दर्पण बनाकर प्रत्येक पाठक को अपने ही भीतर झाँकने के लिए आमंत्रित करता है।
पुस्तक के बयालीस अध्याय इच्छा, प्रेम, अहंकार, महत्वाकांक्षा, संबंध, समय, उत्तरदायित्व, त्याग, वैराग्य और आत्मबोध जैसे जीवन के गहन आयामों की सहज, संवेदनशील और विचारोत्तेजक शैली में प्रस्तुत करते हैं। प्रत्येक अध्याय कथा से आगे बढ़कर पाठक के जीवन से संवाद करता है और उसे अपने अनुभवों, निर्णयों तथा जीवन-दृष्टि पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करता है।
महाभारत की कालजयी कथा से प्रेरित यह पुस्तक भारतीय दर्शन, मानवीय मनोविज्ञान और जीवनानुभवों का एक सुंदर संगम है। यह किसी निष्कर्ष को थोपती नहीं, बल्कि ऐसे प्रश्न छोड़ती है जो पाठक के भीतर लंबे समय तक जीवित रहते हैं।
यदि इस पुस्तक को पढ़ते-पढ़ते आपको ययाति कम और अपना ही प्रतिबिंब अधिक दिखाई देने लगे, तो समझिए कि आपकी अपनी “मनुष्य की खोज” आरम्भ हो चुकी है।
About the Author
सचिन अ लेले का जीवन स्वयं एक यात्ना रहा है- इंदौर की हिंदी संस्कृति से लेकर पुणे की मराठी परंपरा तक, और कॉर्पोरेट नेतृत्व से लेकर भारतीय दर्शन एवं मिथकीय चिंतन तक। लगभग तीन दशकों के व्यावसायिक जीवन में उन्हें यूरोप, अमेरिका, मेक्सिको, अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य-पूर्व और भारत के अनेक क्षेत्रों की यात्राएँ करने तथा विविध संस्कृतियों, भाषाओं और जीवन-दृष्टियों वाले लोगों के साथ कार्य करने का अवसर मिला। इस अनुभव ने उन्हें एक गहरे सत्य का एहसास कराया- मनुष्य का बाहरी संसार भले अलग-अलग हो, लेकिन उसकी भीतरी खोज लगभग एक जैसी होती है। भारतीय दर्शन, महाभारत, रामायण, पुराणों, इतिहास, खेल और मानव मनोविज्ञान में उनकी गहरी रुचि ने इस प्रश्न को और व्यापक बनाया-
“मनुष्य वास्तव में खोज क्या रहा है?”
इसी प्रश्न ने आगे चलकर “मनुष्य की खोज” का रूप लिया- एक ऐसी पुस्तक, जो ययाति की कथा से आरम्भहोकर अंततः प्रत्येक पाठक को उसके अपने भीतर ले जाती है।






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