मेरा सफ़र–किचन से कॉर्पोरेट तक: बढ़ेगा वही, जो लड़ेगा | Mera Safar–Kitchen Se Corporate Tak: Badhega Wahi, Jo Ladega
₹299.00
- By: सुभाष चन्द्र ( Subhash Chandra)
- ISBN: 9789376866410
- Price: 299/-
- Page: 166
- Size: 5×8
- Category: SELF-HELP / General
- Language: Hindi
- Delivery Time: 07-09 Days
Description
About The Book
“मेरा सफ़र — किचन से कॉर्पोरेट तक” एक सच्ची, प्रेरणादायक आत्मकथा है जो उत्तराखंड के एक छोटे पहाड़ी कस्बे पुरोला से शुरू होकर Infosys जैसी कॉर्पोरेट कंपनी तक पहुँचने की यात्रा को बयान करती है।
यह किताब एक ऐसे इंसान की कहानी है जिसने दो साल की उम्र में पिता को खोया, माँ की नथुनी बिकते देखी, भूखे पेट दिन गुज़ारे — और फिर भी हार नहीं मानी। इसमें एक माँ का अदम्य साहस है, एक निःस्वार्थ मार्गदर्शक “बाबूजी” की असीम मानवता है, और एक आम इंसान की असाधारण जिजीविषा है।
यह किताब चार पड़ावों में विभाजित है — बचपन की चौखट से लेकर संघर्षों की सीढ़ियाँ, रिश्तों की रेखाएँ और परिवार व पहचान तक। 39 अध्यायों में यह सफ़र न केवल एक व्यक्ति की कहानी है, बल्कि हर उस इंसान की आवाज़ है जो संघर्ष में भी अपने सपने जीवित रखना चाहता है।
“यह कोई चकाचौंध भरी सफलता की कहानी नहीं — यह उस आम इंसान की असामान्य यात्रा है जो मिट्टी में पला, माँ की ममता से पका, साहब की दृष्टि से निखरा और संघर्ष की आँच में तपकर अपने को गढ़ता गया।”
About The Author
सुभाष चन्द्र एक अनुभवी आई.टी. प्रोफेशनल और संवेदनशील लेखक हैं, जिनकी जीवन-यात्रा अभावों और संघर्षों से शुरू होकर शिक्षा, आत्मसम्मान, निरंतर सीखने और दृढ़ संकल्प के माध्यम से कॉर्पोरेट जगत तक पहुँची है। लगभग 15 वर्षों के आई.टी. अनुभव के साथ वे वर्तमान में Infosys में कार्यरत हैं।
सीमित आर्थिक संसाधनों और कठिन पारिवारिक परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने शिक्षा को अपने जीवन की सबसे बड़ी पूँजी माना। बी.ए. की शिक्षा पूरी करने के बाद कंप्यूटर शिक्षा और एम.सी.ए. के माध्यम से उन्होंने तकनीकी क्षेत्र में अपने लिए एक नई राह बनाई। छोटी-छोटी नौकरियों, असफलताओं और अनेक चुनौतियों से गुज़रते हुए उन्होंने अपनी एक सशक्त पेशेवर पहचान बनाई।
लेखन उनके लिए केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों को अर्थ देने का माध्यम है। कविता और ग़ज़ल के प्रति उनका लगाव उनकी संवेदनशील दृष्टि को दर्शाता है।
“मेरा सफ़र — किचन से कॉर्पोरेट तक” उनके लगभग 25 वर्षों के संघर्ष, रिश्तों, आत्मसम्मान, असफलताओं, सीख और उपलब्धियों की आत्मीय यात्रा है। यह पुस्तक उन लोगों के लिए एक प्रेरक दस्तावेज़ है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सपनों, विश्वास और आत्मसम्मान को जीवित रखते हैं।
उनका जीवन-दर्शन सरल है — मेहनत और ईमानदारी से चलने वाला रास्ता भले लंबा हो, लेकिन वह इंसान को मंज़िल के साथ-साथ अपनी पहचान भी देता है।






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